संपादकीय: रील का रॉबिनहुड - युवा का गलत रोल मॉडल क्यो?

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17 जून 2026 को बिहार के भोजपुर में 26 वर्षीय भरत तिवारी का पुलिस एनकाउंटर में मारा जाना सिर्फ एक घटना नहीं, एक सवाल है। BSc पास, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता सामाजिक कार्यकर्ता, जिसके पास से अवैध हथियार बरामद होने का दावा है, और जिसका फेसबुक लाइव पर हथियार लहराते वीडियो वायरल हुआ। न्यायिक जांच बताएगी कि वो फर्जी एनकाउंटर था या आत्मरक्षा। लेकिन उससे बड़ा सवाल ये है - भरत जैसे पढ़े-लिखे युवा 'कलम' छोड़ 'कट्टे' की तरफ क्यों मुड़ रहे हैं?

1. सिस्टम का खोखलापन सबसे बड़ा कारण

जब सालों की डिग्री और तैयारी के बाद भी युवा को रोजगार न मिले, जब स्थानीय मुद्दे उठाने पर सुनवाई के बजाय मुकदमे मिलें, तो उसका सिस्टम से भरोसा टूटता है। उसे लगता है कि 'कलम से नहीं, कट्टे से इज्जत मिलती है'। भरत तिवारी खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताता था। अगर व्यवस्था ने उसकी आवाज सुनी होती, तो शायद उसे फेसबुक लाइव पर पुलिस को ललकारने की जरूरत न पड़ती।

2. सोशल मीडिया का '2 मिनट फेम' का नशा। 

आज का युवा देख रहा है कि हथियार लहराकर, पुलिस को गाली देकर बनाई गई 30 सेकंड की रील लाखों व्यूज बटोर लेती है। फॉलोअर, कमेंट में 'भैया' की वाह-वाही, और लोकल लेवल पर 'दबंग' की इमेज। ये शॉर्टकट 'सक्सेस' का भ्रम पैदा करता है। भरत का आखिरी वीडियो इसका उदाहरण है। पर युवा भूल जाता है कि कैमरे के पीछे कानून खड़ा है, और एक गोली सारे लाइक्स का हिसाब बराबर कर देती है।

3. 'रॉबिनहुड' की झूठी चमक

गांव-कस्बों में जब आम आदमी को लगता है कि न नेता सुनता है न अफसर, तब जो व्यक्ति 'सिस्टम से टकराता' दिखता है, वो मसीहा लगने लगता है, चाहें तरीका गलत है या सही, ये देखने की फुर्सत किसी को नहीं। हथियार-दहशत-पैसा-इज्जत, ये खतरनाक फॉर्मूला युवा के दिमाग में घर कर गया है।

4. सिनेमा और रील्स का कुप्रभाव 

जब वेब सीरीज और फिल्मों में गैंगस्टर को 'स्टाइल आइकन' बनाकर पेश किया जाएगा, तो असल जिंदगी का युवा भी उसी नक्शेकदम पर चलेगा। उसे लगता है कि क्लाइमेक्स में हीरो बच जाएगा। पर असल जिंदगी में 'एनकाउंटर' ही क्लाइमेक्स होता है।

समाधान क्या है?

पहली जिम्मेदारी राज्य की है। रोजगार, त्वरित न्याय और युवाओं की सुनवाई का तंत्र मजबूत करना होगा ताकि उन्हें न लगे कि 'कट्टा' ही आखिरी विकल्प है। दूसरी जिम्मेदारी समाज और परिवार की है। हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि 'रील का रॉबिनहुड अक्सर जेल का मुजरिम या लाश बनता है'। उसकी मां की आंख का पानी कोई 'व्यूज' नहीं गिनता। भरत तिवारी केस में न्याय होगा या नहीं, ये कोर्ट तय करेगा। लेकिन हर गांव में जो 'भरत' बनने की लाइन में लगा है, उसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। सिस्टम से लड़ना है तो वोट से लड़िए, सवाल से लड़िए, RTI से लड़िए, कलम से लड़िए। क्योंकि कट्टे से लड़ोगे तो घुटने में गोली ही मिलेगी, और 2 मिनट के फेम के बदले जिंदगी भर का 'गेम ओवर'।

सिस्टम गलत हो सकता है, पर सिस्टम सुधारने का तरीका 'एनकाउंटर' नहीं 'एजुकेशन' है। युवा 'गैम्लर' को नहीं, डॉ. कलाम को रोल मॉडल बनाए। तभी बिहार और देश बचेगा।

लेखक: प्रांशु वर्मा अपराध संवाददाता लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश 


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