EXCLUSIVE: लखीमपुर खीरी में पुलिस का "बंदर घोटाला" - मालखाने से 1 करोड़ का सोना गायब, कोर्ट ने कहा दोषियों पर FIR करो
लखीमपुर खीरी : कभी-कभी अदालतों में ऐसे मामले सामने आते हैं, जो किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगते, लेकिन जब ऐसी कहानी कानून की रक्षा करने वाली संस्था की ओर से सुनाई जाए, तो सवाल केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर खड़े हो जाते हैं.
लखीमपुर खीरी की सदर कोतवाली से जुड़ा एक ऐसा ही मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें करोड़ों रुपये मूल्य के सोने के आभूषणों के गायब होने पर पुलिस ने अदालत को बताया कि बारिश में पोटलियां खराब हो गईं और बाद में बंदर जेवर उठा ले गए. अदालत ने इस दलील को न सिर्फ अविश्वसनीय माना, बल्कि पूरे प्रकरण को गंभीर कदाचार की श्रेणी में रखते हुए कड़ी टिप्पणी की है.
दरअसल, इस मामले की शुरुआत साल 2007 में हुई थी. दीपावली की रात शहर के कपूरथला मोहल्ले में रहने वाली रानी अग्रवाल उर्फ जूली की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. पोस्टमार्टम के दौरान उनके शरीर से उतारे गए सोने के बहुमूल्य आभूषण पुलिस को सुपुर्द किए गए थे. इनमें सोने की चेन, लॉकेट, अंगूठी, नाक की कील और कई भारी चूड़ियां शामिल थीं. इन सभी आभूषणों को पुलिस ने मालखाने में सुरक्षित रखने का दावा किया था, जिनकी अनुमानित कीमत करीब 1 करोड़ रुपए बताई गई है.
दूसरी ओर, मृतका के मायके पक्ष की शिकायत पर पति मुदित अग्रवाल और उनके परिजनों के खिलाफ दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ. मामला अदालत में पहुंचा और वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया चलती रही. इस दौरान जब्त किए गए आभूषण न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि वर्षों तक ये आभूषण अदालत में प्रस्तुत नहीं किए जा सके, जिसके कारण मुकदमे की सुनवाई भी प्रभावित हुई.
पुलिस ने कहा- बंदरों ने जेवरों को नुकसान पहुंचाया
फरवरी 2024 में अदालत ने सबूतों के अभाव में मुदित अग्रवाल और उनके परिवार को बरी कर दिया. इसके बाद जब उन्होंने अपने आभूषण वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की, तब मालखाने में जमा संपत्ति का पूरा रहस्य सामने आया. अदालत के निर्देश पर पुलिस ने जो रिपोर्ट पेश की, उसमें दावा किया गया कि वर्ष 2013 में मालखाने की पोटलियों को सुखाने के लिए छत पर रखा गया था. इसी दौरान अचानक बारिश आ गई और बाद में बंदरों ने वहां रखे जेवरों को नुकसान पहुंचा दिया.
अदालत ने मानने से साफ किया इनकार
अदालत ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया. न्यायालय ने टिप्पणी की कि सोना पानी में नहीं गलता और करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति को खुले में छोड़ देना किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था का हिस्सा नहीं हो सकता. अदालत ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि बहुमूल्य आभूषणों के साथ छेड़छाड़ की गई और रिकॉर्ड में फर्जी प्रविष्टियां दर्ज कर मामले को दबाने की कोशिश हुई.
मुकदमा दर्ज करने और क्षतिपूर्ति देने का आदेश
अदालत ने जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने और पीड़ित को क्षतिपूर्ति देने का आदेश देकर संकेत दे दिया है कि जवाबदेही तय किए बिना यह मामला समाप्त नहीं होगा. वहीं, यह मामला सामने आने के बाद लोगों में सवाल उठ रहा है कि अगर मालखाने में जमा संपत्ति सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिकों का भरोसा किस आधार पर कायम रहेगा? क्या करोड़ों रुपये के जेवर वास्तव में गायब हुए या फिर उनकी गुमशुदगी के पीछे कोई सुनियोजित खेल था?
इस मामले में अधिवक्ता शैलेन्द्र सिंह गौड़ ने कहा कि जब न्यायालय से बरी होने के बाद मुदित अग्रवाल ने अपने जेवर वापस मांगे, तब पुलिस की ओर से बताया गया कि पोटली बारिश में खराब हो गई थी और बाद में उसे सुखाने के दौरान बंदर जेवर उठा ले गए. यह स्पष्टीकरण न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है. पंचनामा में दर्ज जेवरों की कीमत वर्तमान समय में लगभग एक करोड़ रुपये आंकी जा रही है।

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