उत्तर प्रदेश के कईं गांवों में चहकने-फुदकने वाली गौरैया का आखिर संरक्षण क्यों है ज़रूरी?

ऐसे रूठी नन्ही गौरैया,सूना हुआ आंगन, गायब हुई घर की रौनक

पेड़ की शाख पर बैठी नन्हीं गौरैया


लखीमपुर खीरी। जिले के ग्रामीण अंचलों में घर के आंगन में नन्ही परी की तरह फुदकने वाली गौरैया अब मुश्किल से ही नजर आती है। इंसानी रहन सहन में आए बदलाव से गौरिया रूठी तो घर की रौनक ही चली गई। रूठे भी क्यों न हमने उनके घर ही नहीं छीने, बल्कि उन्हें दाना पानी देना भी भूल गए। उनके कुदरती भोजन को बर्बाद करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। घर ऐसे बनने लगे कि गौरैया के घोसला बनाने के लिए जगह ही नहीं बची।


 

ग्राम डालुआपुर में नन्हीं गौरेया उगली पर बैठकर ली गई छवि


आज से 20/25 साल पहले तक गौरैया घर-परिवार का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। घर के आंगन में फुदकती गौरैया, बच्चे उनके पीछे नन्हे-नन्हे कदमों से भागते बच्चे। अनाज साफ करती मां के पहलू में दुबक कर नन्ही गौरैयों का दाना चुगना और और फिर फुर्र से उड़कर झरोखों में बैठ जाना। अब यह नजारे शहर तो क्या गांवों में भी नहीं दिखते हैं। गौरैया घर परिवार की खुशी थी, जो अब छिन गई है।


खत्म होती हरियाली, उसकी जगह खड़े होते कंक्रीट के जंगल, खेतों में कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से न केवल उसका कुदरती भोजन छिना, बल्कि उनका आशियाना भी छिन गया। अब मोबाइल टावरों से बढ़ता रेडिएशन उनकी जान लेने पर तुला है। युवराज दत्त महाविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग के रिटायर्ड विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार आगा कहते हैं कि फसलों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से परिंदों की दुनिया ही उजड़ रही है। गौरैया का भोजन अनाज के दाने और मुलायम कीड़े हैं।

गौरैया के चूजे तो केवल कीड़ों के लार्वा खाकर ही जीते हैं। कीटनाशकों से कीड़ों के लार्वा मर जाते हैं। ऐसे में चूजों के लिए तो भोजन ही खत्म हो गया है। पक्षी प्रेमी और गौरैया संरक्षण के लिए लगातार प्रयास करने वाले केके मिश्रा का कहना है कि गौरैया आमतौर पर पेड़ों पर अपने घोंसले बनाती है। पेड़-पौधे लगातार कम होते जा रहे हैं। यह घर के झरोखों में भी घोंसले बना लेती है। अब जिस शैली में घरों का निर्माण हो रहा है उसमें झरोखे बनते ही नहीं। जब झरोखे नहीं तो गौरैया आखिर घोंसला कहां बनाए।


वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें,अनलेडेड पेट्रोल के इस्तेमाल से निकलने वाली जहरीली गैस भी गौरैया और अन्य परिंदों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं।

प्रांशु वर्मा लेखक लखीमपुर खीरी पिन कोड 261501



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