गमछा शान नहीं, किसान की पहचान है श्यामू शुक्ला उसका नाम है।

एक किसान नेता की आवाज बन जाए हजारों किसानों की उम्मीद



1.मैगलगंज की पहचान बना एक चेहरा

लखीमपुर खीरी के मैगलगंज में अगर किसी का नाम किसान की चौपाल पर सबसे ज्यादा लिया जाता है, तो वो है श्यामू शुक्ला उर्फ प्रदीप शुक्ला सफेद कुर्ता, कंधे पर गमछा, और माइक पर एक ही नारा जब तक किसान की सुध न ली जाएगी, ये ट्रैक्टर यूं ही चलता रहेगा।

2. श्यामू शुक्ला की शुरुआत: खेत की मिट्टी से निकला नेता  

2018-19 का दौर,गन्ना किसान का भुगतान 2 साल से अटका। बिजली का बिल बिना मीटर के हजारों में। आवारा पशु पूरी फसल चर जाएं। प्रधान से लेखपाल तक सबके दरवाजे पर किसान माथा पटक रहा था। तभी श्यामू शुक्ला ने भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) का झंडा उठाया। लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर के गांव-गांव घूमे। कहा अकेले रोने से कुछ नहीं होगा, एक साथ दहाड़ना पड़ेगा।

3. वो दिन जब कलेक्ट्रेट हिल गई थी।

पहली ट्रैक्टर रैली: मैगलगंज से लखीमपुर तक 300 से ज्यादा ट्रैक्टर। आगे-आगे श्यामू शुक्ला। पीछे हजारों किसान। मांग साफ थी,गन्ना भुगतान दो, बिजली बिल माफ करो, छुट्टा पशु से छुटकारा दो,अफसरों ने पहले टाला। फिर कुर्सी छोड़कर बाहर आना पड़ा। *हरनाम सिंह वर्मा* ने देखा तो बोले - "लड़का दम रखता है।" नतीजा - प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी श्यामू के कंधों पर।

4. क्यों खास हैं श्यामू शुक्ला?

1. जमीन से जुड़ाव: AC कमरे में नहीं, खेत की मेड़ पर बैठकर किसान की बात सुनते हैं।  

2. संगठन की ताकत: हरदोई से सीतापुर तक यूनियन का नेटवर्क खड़ा किया। अब किसी किसान का शोषण हो तो 1 कॉल पर 100 ट्रैक्टर पहुंच जाते हैं।  

3. प्रशासन से दो-टूक:* DM हो या SDM, बात साफ कहते हैं - "साहब, कागज नहीं, काम चाहिए। वादा नहीं, भुगतान चाहिए।"80 साल के रामखेलावन काका* कहते हैं ,"बेटा, श्यामू से पहले हमको कोई नहीं पूछता था। अब लेखपाल गांव में आने से पहले 10 बार सोचता है।"

5. आंदोलन का तरीका: शोर कम, असर ज्यादा  

श्यामू की सियासत चक्का जाम से ज्यादा ज्ञापन पर भरोसा करती है।  

पहला कदम: कलेक्टर को मांगपत्र, 15 दिन का समय।  

दूसरा कदम: समय पूरा तो शांतिपूर्ण धरना।  

तीसरा कदम: तब जाकर ट्रैक्टर निकलता है।  

इसीलिए प्रशासन भी कहता है,"श्यामू जी से बात हो सकती है। ये मुद्दा लेकर आते हैं, मवालियत लेकर नहीं।"

6. आगे की लड़ाई: अभी मंजिल बाकी है।

आज भी हर महीने किसान पंचायत लगती है। मुद्दे वही - MSP, खाद की कालाबाजारी, बीमा क्लेम। श्यामू शुक्ला कहते हैं,"प्रदेश महासचिव की कुर्सी बड़ी नहीं है। बड़ी जिम्मेदारी है। जब तक आखिरी किसान के चेहरे पर मुस्कान न आ जाए, ये गमछा नहीं उतरेगा।

अंतिम दृश्य: शाम ढल रही है। मैगलगंज की नहर पर 10-12 किसान बैठे हैं। एक नौजवान पूछता है - _"चाचा, श्यामू भाई कब आएंगे ?

बूढ़ा किसान हंसकर बोलता है। "जब जरूरत पड़ेगी, बेटा नेता वो नहीं जो बुलाने से आए, नेता वो है जो तकलीफ सुनकर खुद चला आए।

 लेखक: प्रांशु वर्मा विशेष संवाददाता,

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